शेफाली चतुर्वेदी अनेक विधाओं में सक्रिय पत्रकार हैं। उनकी दृष्टि खासतौर से मानवीय प्रश्नों पर जाती है। जीवन के सकारात्मक पक्ष और उसके लिए संघर्ष करने वालों से जुड़े संवाद लिखने में उन्हें आनन्द आता है। यहाँ पढ़े गुजरात में सक्रिय आशाओं पर उनकी एक रपट।
अब तक सुना था कि ‘ममता’ और ‘आशा’ को सिर्फ महसूस किया जा सकता है।अब, तीन दिन के अपने गुजरात प्रवास के बाद मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि ‘ममता’ को देखा और ‘आशा’ को सुना भी जा सकता है।गुजरात के आदिवासी बहुल पर औद्योगिक ज़िले वल्साड में धर्मपुरा ब्लाक में ‘मान’ नदी के मुहाने पर बसा है गांव ‘शेरीमल’ ।करीब 3000 की आबादी वाला यह गाँव आज गुजरात के ही बाकी 26 ज़िलो के सभी गाँवों का प्रेरणास्रोत है।यह कहना मुश्किल है कि यहाँ ‘आशाओं’ का संगीत ममता का सृजन कर रहा है या ‘ममता’ की प्रेरणा से ‘आशाओं’ का संगीत उत्पन्न हो रहा है।