टीकाकारी की सही मालूमात फ़राहम करना, ग़लत फ़हमियों-ओ-शक-ओ-शुबहात को दूर करना ,टीकों की मांग पैदा करना , बढ़ाना और ख़िदमत फ़राहम करने वालों-ओ-सरकार पर इस काम को बेहतर करने का दबाओ बनाना सहाफियों का काम है। ये बातें सम्यक फाउंडेशन के इश्तिराक से राय पर में मुनाक़िद यूनिसेफ की रीजनल मीडीया वर्कशॉप में सामने आएं। इस वर्कशॉप का इफ़्तिताह छत्तीसगढ़ के वज़ीर-ए-आला डाक्टर रमन सिंह ने किया था। डाक्टर रमन सिंह ने अपनी इफ़्तिताही तक़रीर में कहा कि सूबे में बच्चों की अम्वात और माओं की विलादत के दौरान मौत को कम करना इन का अव्वलीन काम है।
बच्चों में ग़िज़ा की कमी से पैदा होने वाले अमराज़ को दूर करना भी ख़ुसूसी तौर पर उन के पेशे नज़र है ।याद रहे कि 2001-ए-में यहां बच्चों की अम्वात की शरह एक हज़ार पर 76थी जो बतदरीज घट कर 2013में 46रह गई इस तरह नैशनल हैल्थ सर्वे NFHS-ll (1989-99)में यहां सिर्फ़ 22 फ़ीसद टीकाकारी रिकार्ड की गई थी ।2005-06में ये आंकड़ा 49 फ़ीसद था जबकि 2012-13में 75 फ़ीसद हो गया है । डाक्टर रमन सिंह के मुताबिक़ टीकाकारी के कवरेज को 75 फ़ीसद तक लाने के लिए इंतिहाई कोशिशें की गई हैं इन का मानना है कि ये अभी भी काफ़ी नहीं है शोबा सेहत का निशाना उस को बढ़ा कर 95 फ़ीसद तक ले जाना है।
